Friday, September 21, 2012

शुक्रिया !....दोस्त....!

 शुक्रिया !....के तुम मेरे दोस्त हो !

इस दुनिया में जो किसी से न कहा जा सके वो तुम से कहा जा सकता है
तुमसे कुछ कहना जैसे ख़ुद से ही बातें करना है
तुम दिल में रहते हो इसीलिए दिल की बातें पहले ही जान लेते हो
सुकून के दो पलों को इसी एक रिश्ते की दरकार है
ममता का आँचल हो या परवरिश का साया
बचपन की शरारत हो या सहारा देते कंधे सहलाते हाथ
ज़मीं से लेकर आसमान तक रिश्तों की कड़ी में
हर रिश्ता अंततः चाहत रखता

है दोस्ती की
जी चाहता है सारी दुनिया को बता दूं कि तुम मेरे दोस्त हो
दोस्ती का हनीमून पीरियड जो चल रहा है...और यूँ भी
मित्रता में होना भी, प्रेम में होना ही तो है !

Tuesday, September 18, 2012

चाहत

हसरत तुम्हें जी भर देख पाने की
पूरी न हो जाए कभी कि फिर
दिल न तरसे तुम्हारी एक झलक को

तुम्हें छूने की चाह रह जाए अधूरी ही कि
छूकर भी तुम्हें छूने की चाहत की
शिद्दत कम न हो कभी

मिलन का छोटा सा वो पल ही भरपूर है
मन की ये अतृप्ति यूँ तृप्त न हो जाये कहीं

कि फिर कोई प्यास ही न रहे बाकी

आत्मा के तल पर तुम्हे महसूस करते
रोम रोम भीग कर पिघलता चला जाये
तुम्हें टूटकर चाहने के लिए
कितना तो ज़रूरी है अधूरी इच्छाओं का पूरा न हो सकना

Saturday, August 18, 2012

अजीब मनःस्थिति में...कभी किसी उदास रात में दो कविताएँ लिखीं थीं...


पहली कविता...


कल रात


जो कुछ कहा तुमने
क्यूँ कहने को मुझे चुना तुमने
वही कह रहे थे तुम
जो मरकर भी सुनना चाहेगा कोई

लेकिन
इस तरह कहा तुमने
कि सुना ही न गया

अपना तो कहा लेकिन
माना कहाँ अपना

जो माना होता
तो कहो तो भला
क्यूँकर कहते
जो कहा तुमने ?

अपना मानते तो भी
कहते वही
जो कहकर एक ही पल में
कर दिया पराया तुमने
****************

 ये दूसरी कविता.....



कभी होता है यूँ भी
कि अपने ही दिल का
पता नहीं होता ख़ुद को

ये जानकर भी कि
तुमने दुखाया है दिल
तुमसे नाराज़ नहीं मैं

चोट खाकर, सबकुछ सह कर भी
तुमपे गुस्सा नहीं आया
क्यूँ आख़िर ?

तुम तो कोई नही हो न मेरे
सिर्फ एक दोस्त...जस्ट ए फ्रेंड
तो क्यूँ ये सोचकर
हैरान है दिल कि

तुम उदास होगे
परेशान होगे
ख़ुद से नाराज़ होगे

ये दिल भी ना ,अजीब शै है
धड़कने से इसके ज़िंदा हैं हम
धड़कनों से इसकी जीना मुहाल है


Friday, August 17, 2012

एक सवाल ऐसा भी -----------------------

आज फिर भीगा है मन
स्नेह से तरबतर हैं
सजल नयन
सोचकर हैरान हूँ
कैसा था वो पल निर्मल
आँखों में वो तड़प
हो रहा तन मन विकल
मीलों लम्बी थी गहराती
रात आधी
अन्धकार था ज़्यादा घना या
ख़ामोशी  इसकी
दूर आसमाँ पर था चमकता
एक बुज़ुर्ग  सितारा
पिता के बारहा ज़िक्र पर
पनीली आँखों से तड़प कर
झिझकते संकोच से लरज़ते
स्वर में पूछा  था  ये सवाल
'' क्या हम , अपना रिश्ता बदल सकते हैं  ???''

Tuesday, August 14, 2012

मासूम ख़यालों ने अपनी आगोश में ,जब कुछ ख़्वाब समेटे ,
कुछ यूँ ही बेइरादा ख़्वाहिशें , आँखों में मुस्कान संजो गईं ,
चहरे की नरमी सुर्ख होकर, नई साँसों की खुशबू में खो गई ,
कुछ नए रंग बिखरे , कुछ नए सुर सजे ,
ज़िन्दगी की नई तस्वीर जैसे ख़्वाबों के रंग से सजी ,
ख़्वाहिशें तरन्नुम में नई ग़ज़ल गुनगुनाने लगीं ,
लेकिन इस बेख़ुदी के न तो ख़्वाब पहचाने से थे ,न ही ख़्वाहिशें ,
चेहरे का नूर , आँखों की मुस्कान , नया रंग और तरन्नुम भी, दुनियाँ से जुदा थे ,
वो क्या था जो बिखर गया....
किसी फ़रिश्ते की दुआओं का शाहकार था शायद...
या थी वो किसी मासूम दिल की, मासूम फ़रियाद...

Sunday, August 12, 2012

 अनदेखी...अनजानी सी
वो ख़ुशबू बहुत जानी पहचानी सी
किसी बियाबान में चलते
महके रातरानी सी

सागर सा अथाह और
पहाड़ी झरने सी उच्‍छृंखल खिलखिलाहट का
अप्रतिम मेल !
विस्मय भी होता है...मान भी
और इस पर उसकी सहजता
अद्भुत !
मुग्ध करती मुझे वो दूर सितारों से आती
आवाज़ या कि दिव्य पुकार
बुलाती है बार-बार
अपने पास और पास

अनजाना ये बंधन दो रूहों का
खींचता है मुझे अनायास
जैसे सृष्टि में कोई सितारा खींचता है
अपने ही पड़ोसी किसी तारे को
उसी तिलस्‍मी तारे की तरह

खिंचती ही चली जाती हूँ मैं
उस अदृश्य डोर से बंधी
बेबस....अवश !

Saturday, July 21, 2012

तुम भी ना एक अजीब शै हो
..............................
................
सिर्फ़ एक मुलाक़ात
छोटी सी...
तुम्हारी कुछ तस्वीरें
कुछ विचार
और हाँ फ़ोन पर चंद बातें
कुल जमा तीन बार
और लो हो गई
एक धरोहर
सारी उम्र की

मुलाक़ात चाहे छोटी ही सही इतनी बदहवासी में भी हमने
साँसों का संगीत सुना
हां, इस बीच तुमने
इक नज़र देखा भी था मुझे
कनखियों से तुम्हें देखती
उन आँखों के नूर से रौशन हुई मैं
उजली-उजली सी
धुली-धुली सी

मिल जाता है हर बार
कुछ न कुछ तुम्हारी छवियों में
इस बार
पलंग के पास मेज़ पर
पेन, डायरी, किताबें और दवाइयां
और वो भरा-भरा ख़ाली सा कमरा

ना जाने किस संवाद में एक बार
पुकारा भी तो था मेरा नाम तुमने
तुम्हारे अनाहत से होता हुआ
विशुद्धि से निकलता मेरा नाम
शुद्ध
सुगन्धित
पवित्र हो गया
और इस तरह हमने एक दूसरे को
दोनों चक्रों से छू भी लिया

सुनो,
उसी छुअन की कसम खाकर कहती हूं
हमारी बातों में वो अबोली..अपरिभाषित बातें
ना जाने क्यूंा कभी-कभी नाकाफी लगती हैं
ज़िन्दगी के लिए

पहले से छलकी हुई मैं कुछ और भर गई
कि रीत गई और कुछ...
अब बस
इतनी-सी तमन्ना है कि
हर जनम बस इतनी सी गुंजाइश देना
मेरे मौला कि किसी तौर तुमसे
जुड़ी रह सकूं मैं...