Saturday, October 13, 2012

ओ! ज़िद्दी मासूम सी लड़की...

ओ! ज़िद्दी मासूम सी लड़की
क्या फिर पुकारा मुझको ?
पुकारा...या धमकाया...डराया मुझको
सर्दी से सुड़कती नाक
और पनीली आँखों को चमकाकर
एक अदृश्य गन पॉइंट मेरे पीछे टिकाकर

लगातार देती हो आदेश
ये करो..वो करो..अरे! अरे! ऐसे नहीं...वैसे
नहीं तो समझ लो
जी है ज़िन्दगी अपनी शर्तों पे अब तक
तुम कहाँ से ऐसे -
महीन अक्षरों वाली चेतावनी सी
मेरे मन में सितारा सी चमकती हो...

Thursday, October 11, 2012

एक भी दिन....तुम बिन...



दिन ढला ऐसे
सांझ उतरी हो मन में जैसे
थककर नाराज़ मन भी
शिकायती हो गया

गहराती रात के साथ
शिकायतें भी
होने लगीं उदास

ढल चुकी है रात
आँखों से टपकती हुई
याचना लिए होठों पर
बची है सिर्फ़ बेबसी

देखा ना...जिया नहीं जाता
एक भी दिन...तुम बिन

Wednesday, October 10, 2012

रात आधी...

नींद की सेज़ पे ख्वाब तेरे
रात भर करवटे बदलते रहे
नजरें आसमां में अक्स बनाती रही
तारे ज़मीन पे बरसते रहे

Tuesday, October 9, 2012

आधी रात......पूरा चाँद....

वो लम्हा ..जब तुम पास थे
मेरी आँखों के दरिया का बांध
तुम्हारे कंधे पर टूट- टूट गया था
तुम्हारा मुझे थामना एक बारिश का ...
उस बांध में फिर- फिर भर जाना था
या टूटी दरार पर तुम्हारा खुद सिमट जाना था
पता नहीं .....
हाँ ! ये पता है एक धड़कन का आरोह

दूसरी के अवरोह से यूँ मिलता था ...
जैसे एक घाटी मिलती है हिम शिखर से
एक दिन तुमने कहा था न , देखो !.....
कैसे ये पूरा चाँद ...थपकियाँ देता है , समंदर को
मैंने चाँद को नहीं, तुम्हे ..निहारा था
आज ...फिर फूटा है , सैलाब
वही आधी रात और ...पूरा चाँद है
तुम नहीं हो ....

Sunday, October 7, 2012

आत्मीय क्षणों में

आत्मीय क्षणों में बातें करते-करते
अचानक तुम मीटिंग में चले गए,
और मैं आटा गूंथने लगी...
अब तुम मीटिंग में हो ऑफिस में
मैं रोटियाँ बना रही हूँ किचन में
तुम्हारी मीटिंग भी
बेनतीजा ही रहने वाली है
रोटियाँ  गोल नहीं बन रही
न ही फूल रही है
हम अब भी बातें कर रहे हैं
उतनी ही आत्मीयता से....

Monday, September 24, 2012

चमकते तारे...

मेरी आँखों में चमकते तारे
तू न आया तो बरस जाएँगे
तू जो आया तो थम न पाएँगे
इनकी फितरत ही कुछ ऐसी है
ये हैं तो मेरे...पर हैं तेरे लिए
रोज़ चले आते हैं ये सांझ ढले
रात भर पलकों पे डब-डबाते हैं
सुबह होते ही छलक जाते हैं
खाली कर जाते हैं निगाहें मेरी
तेरे ख्वाबो के तलबगार हैं ये

Saturday, September 22, 2012

ओ ! ख्‍व़ाबीदा शख्‍स़



सुनो !
कौन हो तुम ?
अजनबी ?
तुम अंजान हो सिर्फ इसलिए न कि
तुम्हारा कोई नाम
कोई चेहरा नहीं ?
तुम्हें कभी देखा नहीं
सुना...छुआ नहीं ?


है तो अजीब लेकिन सच है
रोज़ आते हो ख्यालों में
हर बार अकेला छोड़ जाने के लिए
कभी मिले नहीं मगर
हर बार बिछड़ जाते हो ?

लेकिन सुनो !
तुम्हें इतना और इस क़दर
सोचा है मैंने कि
अब कहीं से नहीं लगता कि
अंजान या कि कोई अजनबी हो तुम

कुछ ख्‍व़ाबीदा शख्‍स़ होते हैं अक्‍सर
बिन चेहरे और पहचान के
जो हमेशा लगते हैं
बिल्‍कुल ऐसे
जैसे तुम...