Monday, November 19, 2012

अर्धसत्य...

तुम झूठ नहीं बोलते
तुमने ही तो कहा
अच्छा ये तो बताओ
अर्धसत्य बोलते हो या
कि वो भी नहीं ??
अगर नहीं तो भूल ही जाओ प्रेम
तुमसे तो हो ही चुका
अब इस जन्म में
प्रेम...

चौबीस में से 72 घंटे तुम्हारे साथ...



अब तुम्हारे साथ और ज्यादा
रहने की चाहत का
हल मिल गया है मुझे
... तुम्हारे साथ में रहने या कि
तुम्हें सोचते हुए
एक पल का मतलब है एक पूरा दिन
और तुम्हारे बिना जीने का मतलब
एक युग जी लेना
इस तरह तुम्हारे होने और न होने के
फर्क को मिटा दिया है मैंने...

Tuesday, November 6, 2012

अहाssssssss टुकुस - टुकुस :)))))))) हाँ!:) वाकई अच्छा लगता है जब मिले कुछ अनेस्पेक्टेड....:)))

आज सुबह की एक छोटी सी घटना जो दिल को छू गयी.....सोचा आपके साथ भी शेयर कर लें....

जो काम हम करते हैं आकाशवाणी में, उसके ड्यूटी आवर्स बड़े ऑड हैं। शिफ्ट ड्यूटी हुआ करती है। कभी सुबह पांच बजे जाना होता है, कभी रात ग्यारह साढ़े ग्यारह लौटना होता है। और अक्सर आते जाते समय कॉलोनी के गार्ड को ज़हमत देनी होती है गेट खोलने के लिए। यूँ तो ये उसका काम ही है लेकिन बहुत बुरा लगता है, जब कई बार सुबह वो नींद

में आँखें मलते हुए लगभग कांपते हुए गेट खोलता है। ख़ास तौर से ठण्ड और बारिश के मौसम में। इसलिए अक्सर सुबह हम गाड़ी से उतर कर ख़ुद ही गेट खोल लिया करते हैं। जब कभी बहुत देर हो रही होती है तो मजबूरन हॉर्न बजाना पड़ता है। एक दिन बहुत हड़बड़ी में थे, दूर ही से हॉर्न भी बजाया लेकिन वो शायद गहरी नींद में था, जाग नही पाया। हमने देखा मिसेस साहू मॉर्निंग वॉक पर निकली हुई हैं, और गेट के क़रीब ही हैं। उन्होंने मुड़ कर देखा भी था। यूँ नहीं था मन में हमारे कि वो हमारे लिए गेट खोलें, और उन्होंने धीरे से एक गेट ज़रा सा खोला और बाहर निकल गयीं और जाते हुए गेट वापस बंद भी कर दिया। हम गाड़ी से उतरे, हमने भी गेट खोला और ज़रा सी स्पीड बढ़ाई कार की और दौड़ते हांफते पहुंचे ऑफिस। आज भी ऐसा ही एक दिन था जब सुबह सुबह देर हो गयी थी। हम कॉलोनी के गेट तक पहुंचे ही थे कि देखा गाड़ी की लाईट देखकर गेट के बाहर एक छोटी बच्ची ने दौड़कर गेट खोलना शुरू किया। गेट थोड़ा भारी है बच्ची बड़ी ज़ोरों से हंसती हुई उसे पूरी ताक़त से उसे धकेल रही थी। तब तक हम भी उतर गए गाड़ी से और हमने दूसरा गेट खोला। बच्ची बहुत खुश थी मुस्कुराकर हमें देख रही थी। और तभी बाहर नज़र गयी बहुत से बच्चे थे, और पीछे कुछ बड़े लोग भी दिखे। ये शायद आसपास के गाँव से आये लोगों का झुण्ड था संभवतः राज्योत्सव देखने आए होंगे।
हमने बच्ची के सर पर प्यार से हाथ फेरा और हमारे मुंह से निकला थैंक यू सो मच...हमारा थैंक्स कहना था और सारे बच्चे एक सुर में चिल्लाए '' यू आर वेलकम मैम '', बच्चों की खिलखिलाती आवाज़ सारी फिज़ा में तैर गयी। ज़रूर स्कूल में टीचर ने सिखाया होगा। ग्रामीण बच्चों का पढ़ना , कुछ सीखकर उसे समय पर इस्तेमाल करना और इन सब से बढ़कर वो '' प्योर इनोसेंस '' जो उनके चेहरों पे होता है उसकी तो बात ही अलग है। हमारे चेहरे पर भी मुस्कान तैर गयी थी। दिल से दुआ उन बच्चों के लिए कि उनके सपने बड़े हों, और सारे सपने पूरे हों।
आज सारा दिन उन बच्चों की रह रह कर याद आती रही।
और निदा फ़ाज़ली भी याद आते रहे -

फ़रिश्ते निकले हैं रौशनी के
हरेक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है
हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब से आकाश
अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं....

Monday, November 5, 2012

अतिरेक

बहुत दूर तक पीछा करती है
इक आवाज़
शायद तुमने पुकारा मुझको
बेतहाशा दौड़ता है मुन्तज़िर दिल तुम तक
मगर तुम शांत खड़े हो.....अविचलित !

यूँ तो तुम्हारा सहज स्वीकार भाव छू जाता है मन को
तुम कभी प्रतिकार नहीं करते
सिर्फ हाँ कहते हो हर बात पर
लेकिन आज मासूम शिकायत है मन की

कि आज तक....कभी, कोई शुरुआत क्यों नहीं की तुमने ?
रहते हो क्यों हमेशा यूँ ही शांत....निर्विकार !

तुमने कहा हम प्रेम में हैं
लेकिन हमेशा बेतलब ही देखा तुम्हें
कहीं कोई भावातिरेक नहीं
यूं बिना अतिरेक भी प्रेम में हुआ जा सकता है....अविचलित !?

वैसे ये भी क्या कम है कि
खुद को प्यार किये जाने की इजाज़त दी है तुमने
रोका नहीं कभी
लेकिन जानते हो
तुम्हारी इस स्थिरता ने
अस्थिर कर दिया है मन
तुम्हारे इस अविचलन ने
कर दिया है बहुत विचलित !

(दिल नाउम्मीद तो नहीं......)

Monday, October 29, 2012

पारदर्शी....पर्दा



तुम्हारी ये तस्वीर
जिसमे मुंह फेर के खड़े हो तुम
यूँ तो बारहा गुज़री है मेरी निगाहों से
बाज़वक़्त ना जाने क्यूँ
उस पर अटक अटक जाती है निगाह


इसमें चश्मे के भीतर से

झांकती आँखें
एक पर्दा है तुम्हारे मेरे बीच,पारदर्शी |
इस परदे से गुरेज़ नहीं
शिकायत तो उन आँखों से है
जो परदे का सहारा ले
तकती हैं कहीं दूर.......बहुत दूर

सच बताना इन आँखों में क्या है ??
चलो झूठ ही कह दो
के मेरी कोई तस्वीर है
जो ठीक इसी तरह बिंध गयी है...

Monday, October 22, 2012

छोssssटा सा वो इक पल...

छोssssटा सा वो इक पल...
तुमने नज़र भर देखा
स्नेह से सिर सहला दिया
और तुम्हारी प्रेमिल पनीली आँखों का इक मोती
मेरे गालों पर ढुलक आया है...

सिर्फ़ उलाहनों को क्या ??

बहुत हुआ
चलो अब यूँ कर लें
कहानी ज़रा मुख़्तसर कर लें
उलाहने लपेटकर कही बातों की
सलवटें ठीक कर लें

आओ कि शाम ने
सुबह से ही उदासी की दस्तक दी थी कई बार
इस बुझे मन से कि कोई
तुम्हें याद करता है सिर्फ़ उलाहनों को क्या ?

बस यूँ समझ लो
आज रात चाँद देखकर
दिल मुस्कुराना चाहता है
गुज़िश्ता मौसमों ने
चाहे लाख ख़ताएं कीं
दरख्तों को बारिशों में भीगना
अच्छा लगता है