Wednesday, February 13, 2013

Rose Day ...

अभी-अभी देखा कि आज Rose Day है -

आँगन में खिले गुलाब से लिपटकर आती हवा गुलाबी
मन में खिल गए हैं अब इतने गुलाब कि
तुम्हारी याद से हो गई हैं आँखें पुर'आब
गुलाबी मौसम की....गुलाबी शाम में
कितनी तरह से खिलते हैं तेरी
यादों के गुलाब...

( आख़िर प्रिय फूल भी तो है )
यादों के झरोखे से
जो निकल के आतीं हैं तस्वीरें
उनमें कहीं तुम हो
लगता तो है कि तुम हो
क्या सचमुच हो ??

( नींद की आगोश में जाने से ठीक पहले...)

आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं .....

नाम है, ख़याल है कि ये याद है तुम्‍हारी....

मन क्‍यों भीग-भीग जाता है तुम्‍हें सोचते ही...

पिछली बार क्‍या हुआ था...

किसी बात पर हमने

एक दूसरे का कहीं दिल तो नहीं दुखाया था...

( आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं ......)
रात भर तो तुमसे नाराज़ रहा
सुबह होते ही सुलह पे आमादा है

नाफ़रमान...बे-ग़ैरत दिल...हुंह...♥

Friday, January 11, 2013

इक ख़ामोश चीख...

लगभग चीखती-सी
दिल को चीरती हुई
तुम्हारी वो अनकही
सुनी मैंने अभी-अभी
लेकिन जाने कैसा शोर बरपा है
इन दिनों हर तरफ ?
भीतर-बाहर का मौसम बड़ा सर्द है
कि तुम्हारी अबोली बातें
न सुन सका दिल
उफ्फ्फ़...कितने उदास
कितने हताश हुए होगे तुम
चीखने से ठीक पहले
कितना तड़पे होगे
जानते हो
अनजाने ही हुआ सब
कभी होता भी तो है कि
हम सुनने की हालत में
लिसनिंग मोड में नहीं होते
अब सुन ली है दिल ने
वो अनकही सदा तुम्हारी
अबोले की गलतफहमियां नहीं होंगी
इतना तो यकीन है ही
और यूँ भी अस्फुट स्वरों में
बिना कुछ कहे
जैसे दूर बैठे बतियाते हैं
हमेशा बतियाते रहेंगे हम !

Saturday, December 8, 2012

फिर वही सुबह...

फिर वही सुबह
दो कप चाय...अखबार...रेडियो ...
कोई बातचीत नहीं हमारे बीच
लेकिन मौजूदगी का पूरा पूरा एहसास
हम नहीं बोलते
लेकिन सुबह बोलती है
तुम फोन पर बतियाते
मैं ख़ुद में उलझी

अपने-अपने कामों में मसरूफ हम
जैसे बगीचे में दो परिंदे चुपचाप
एक दूजे की चिंता में उतने ही डूबे

फिर वही सुबह है
एक कप चाय...अखबार...रेडियो...
परिंदों का चुप-गान सुनाई नहीं देता आज
ये अबोली सुबह नहीं भाती तुम बिन

Friday, December 7, 2012

काश...! जब मैं रोती...

काश...!
जब मैं रोती...

जब फूट पड़ती भीतर
वर्षा वन की बदली
सैलाब से जज़्बात के
होठों पर चुप सी
अलफ़ाज़ सारे
आँखों से बह निकलते
तुम होठों से पढ़ते
ठंडा मुलायम स्पर्श तुम्हारा
राहत देता...समेट लेता
तपते गालों पर फ़ना हुए आंसुओं को

लेकिन ऐन रुलाई के वक़्त
तुम तो गुस्से से एक तर्जनी दिखाते हो
चुप्प्प...बिलकुल चुप कहते हुए
खबरदार करते हुए कि
एक बूँद भी आंसू टपकाया तो...

कातर आंसू तो ठिठक जाते हैं
मगर सिसकियाँ नहीं थमतीं
हिचकियों में तब्दील हो जातीं हैं

यूँ तो मुझे पता है
रोता हुआ नहीं देख पाते मुझे तुम
लेकिन कभी तो...
कभी तो यूँ भी हो कि
जब मैं रोऊँ...काश...
तुम्हारा पूरा वजूद
रुमाल बन जाए

इत्ती छोटी सी तो तमन्ना है...