Tuesday, May 21, 2013

'' जाने किस रंग से रूठेगी तबीयत उसकी
जाने अब किस ढंग से उसको मनाना होगा ''

तुमसे ग़र रूठ जाए कोई....तुम भला किस तरह मनाओगे ??
क्यों हर बात इस इंतज़ार में रहती है कि तुम सुन लो जो ज़रूरी नहीं है तुम्हारे लिए ...
तुम वहाँ होते ही नहीं हो जहां दिखते हो...
तुमने क्यूँ खुद को छुपा रक्खा है कि किसी भी तरह तुम तक पहुंचा नहीं जा सकता...
लेकिन, ऐसे में भी तुम दूर नहीं लगते हो...
सफ़र की वीरानगी ओढ़े हुए न जाने क्या तलाश करते क़दम चल रहे थे ...न साथ की चाहत थी न मंज़िल की तिश्नगी ....बात थी इक सांस की जो लिए जा रहे थे....साया सा कोई एहसास जो साथ चल रहा था...आँखें थीं उसकी मुन्तज़िर ....दिल यकीन से भरा हुआ....साथ होने के जज़्बे से क़दम मिल रहे थे ....चेहरे में उसके इक अपनी सी बेगानगी थी ....साथ इक अजनबी के हम अपनी ज़िन्दगी से मिल रहे थे...

दरअसल तस्वीरें सांस लेतीं हैं लम्हे ज़िंदा रखने को...

कुछ चेहरे तस्वीरें बने सामने पड़े थे ... आवाजें सुनने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.... दिल इस सोच में रहा करता कि कैसे बुलाएं आवाज़ों को.... कभी आवाज़ें होती ...तो चेहरे नहीं होते और चेहरे होते तो आवाज़ें खो जाती....कशमकश में ही थे कि ....तस्वीर ने हमारा नाम लेकर पुकारा.....:)) :))

''मन हर वक़्त किसी न किसी खुशबू के साथ रहा करता है...''



मैसूर संदल सोप...इस साबुन की खुशबू के साथ स्कूल की रोड पर लैंटाना घास की खुशबू का मिश्रण याद है, जो गीदम ( बस्तर का एक गाँव ) की याद दिलाता है ....जब -सुबह सवेरे नहा धोकर पापाजी की मोटरसायकल में बैठ कर स्कूल जाया करते थे...आज भी कभी-कभी सुबह सात बजे के आस-पास बरबस ही वो खुशबू याद आ जाया करती है...

फरसगांव में घर से लगा हुआ घना जंगल था ....उस जंगल की अजब सी खुशबू ...और ख़ास ये कि दिन के वक़्त वो जंगल जितना खूबसूरत लगा करता ....रात होते होते उतना ज्यादा डरावना हो जाया करता ...और रात को वो खुशबू भी कुछ गुनगुनी सी हो जाया करती ....याद करके अब भी दिल धड़क जाता है....

पहली बार किसी विदेशी महिला को देखा था ...उसके परफ्यूम की खुशबू भी अब तक है ज़ेहन में ....

पापाजी की म्यूज़िक लाइब्रेरी की खुशबू तो अद्भुत है....बहुत गहरी खुशबू है...

सारे एल पी / ई पी की तस्वीरें तक याद हैं ....याद है किस रिकॉर्ड के बीच में ...किसी में लाल रंग था ...किसी में बैगनी ...किसी में काला...

और किताबों की खुशबू ....आह!

हर किताब की अलहदा खुशबू ....स्कूल बुक्स की अलग ...कॉमिक्स की अलग ...हर किताब को छूने का एहसास अलग ....मन डूब-डूब जाता है इन खुशबुओं में...

कुछ आवाज़ों की खुशबुएँ क़ैद हैं ज़ेहन में....और कुछ रंगों की भी....हर आवाज़ की अलग ...हर रंग की अलग खुशबू ....

ऐसी ही जाने कितनी खुशबुओं से घिरा रहता है मन....इन खुशबुओं से बड़ा प्यार है हमें ....बहुत प्यार....इन ख़ुशबुओं का हमारे बचपन की यादों से बड़ा गहरा सम्बन्ध है...

ख्यालों की दुनिया

ख्यालों की दुनिया
नज़र नवाज़ नज़ारों की दुनिया
हक़ीक़त के कितने क़रीब...लेकिन कितनी दूर
इक ज़रा हाथ बढ़ाया और चाँद बांहों में
और कहीं ख्यालों में ही बिछड़ जाए कोई
तो जैसे जान ही लेकर जाए